Thursday, January 21, 2010

दर्शन की परिभाषा

दर्शन की कोई निश्चित परिभाषा देना काफी कठिन है लेकिन फिर भी बिना परिभाषा के किसी भी विज्ञानं या समाज विज्ञानं के अर्थ को नही समझा जा सकता। इस लेख में हम दर्शन की एक परिभाषा का विश्लेषण करेंगे।
"अनवरत और प्रयत्नशील चिंतन की बौधिक व्याख्या और उसके मूल्याङ्कन का प्रयास दर्शन कहलाता है।"
उपरोक्त परिभाषा में बहुत सी कठिनाइयाँ हें। इनको समझने से पहले हमें इसके विभिन्न घटकों को देखना होगा।

अनवरत शब्द का अर्थ है, लगातार /परम्परा से। लेकिन यहाँ पर अपवाद है की जब कोई दार्शनिक सोचता है, शायद वह कुछ नया दे दे । अत: यह शब्द सार्थक तो है, लेकिन परिभाषा में अनावश्यक है।

प्रयत्नशील चिंतन :
चिंतन दो प्रकार का है:
१ स्वाभाविक चिंतन (thinking without efforts) जैसे- मन में ख्यालों का चलना।
२ प्रयत्नशील चिन्तन ( thinking with efforts) - कोशिश द्वारा अर्थात जिसमे क्रमानुसार प्रक्रिया होती है। लेकिन ऐसा चिंतन बौधिक ही है। अत: इसको अलग कहने की आवश्यकता नहीं है। साथ ही केवल दर्शन ही नही अन्य विज्ञानों में भी प्रयत्नशील चिन्तन होता है और साथ में व्यावहारिक जीवन में हम कोई कम करने के लिए भी इसका इस्तेमाल करते है, लेकिन यह दर्शन नहीं है। जैसे यात्रा से पहले समय सारणी व कार्यक्रम बनाना।

चिन्तन के इस भेद को महत्वपूर्ण माना गया है। इसे तार्किक (logical) या प्रत्ययात्मक (conceptual) भेद कहा जाता है।

किसी भी परिभाषा को दो दोषों से रहित होना चाहिए -
१ अतिव्याप्ति दोष २ अव्याप्ति दोष

परिभाषा उस वस्तु के लक्षणों का मुख्यत: वर्णन करती है, लेकिन उपरोक्त परिभाषा की कमियों को हमें देखना होगा। अतिव्याप्ति दोष उसे कहते हैं, जिसमें लक्षण उस वस्तु के अलावा अन्य में भी रहते हैं जैसे 'गाय' उसे कहते ही, जिसके चार थन होते ही, इसमें अतिव्याप्ति दोष है , क्योंकि भैंस इत्यादि के भी ऐसा होता है।

अव्याप्ति दोष उसे कहते है, जिसमें लक्षण अव्याप्त होता है, यानि अपूर्ण होता है, जैसे 'गाय' उसे कहते है, जो सफ़ेद होती है। यह लक्षण भी पर्याप्त नही है, क्योंकि गाय काली, भूरी इत्यादि हो सकती है।
उपरोक्त परिभाषा में प्रयत्नशील चिन्तन अन्य विज्ञानों में भी ही। अत: अतिव्याप्ति दोष ही और बौधिक व्याख्या का ही अंग ही।
जो लक्षण दो वस्तुओं में भेद प्रकट कर , उन्हें स्पष्ट करता है वह व्यव्छेद्क धर्म (differentiating characterstic) कहलाता है। वह परिभाषा में होना चाहिए । वैशेषिक दर्शन में 'कर्म' के लिए 'गति' व्यावर्तक धर्म है, क्योंकि यह उसे अन्यों से भेद दिखलाती है क्योंकि जहाँ भी कर्म है, वहां गति है, जैसे हाथ हिलाना।
दर्शन की परिभाषा के लिए एक और गुण है, जो बहुत आवश्यक है, जिससे वह अन्य बौधिक व्याख्याओं या विज्ञानों से उसे अलग करता है, यह है- इन्द्रियानुभाव निरपेक्ष होना यानि इन्द्रियानुभाव से परे होना।
लेकिन यहाँ परशान उठता है की इन्द्रियानुभाव निरपेक्ष होना गणित और तर्कशास्त्र में भी पाया जाता है, फिर यहाँ अंतर क्या रह जाता है ?
उतर है- दर्शन मानव-जीवन के विविध पक्षों को लेकर चलता है, जबकि गणित इससे बहुत भिन्न होता है। advanced mathematics केवल अवधारनाओं से भरा है। अनुभूति का कोई स्थान नही। अत: दर्शन की परिभाषा निम्न दी जा सकती है-
"मानव-जीवन के विविध पक्षों का बौधिक -अव्धारनात्मक चिन्तन या ऐसे चिन्तन का आलोचनात्मक मूल्यांकन दर्शन है।" (Pure rational-conceptual thought regarding different aspects of human life or a critical thought over such kind of thoughts may be called as philosophy.)

दर्शन की अन्य विशेषता यह है की यह self- critical है। कहने का भाव यही है की दर्शन ही एक मात्र ऐसा विषय है, जो अपने स्वरूप के बारे में सोचता है। अन्य विषय ऐसा नही करते। जैसे :

इतिहास क्या है?

विज्ञानं क्या है?

गणित क्या है?

विधि क्या है?

दर्शन ही एक मात्र विषय है, जो इसके बारे चिन्तन करता है, यह सभी के स्वरूप की अवधारनाओं का अद्ध्यन करता है।

आस्तित्ववादी दार्शनिक इससे भिन्न विचार रखते है, वे कहते है की बुद्धि या तर्क से जब हम मानव जीवन से सम्बन्धित अवधारणों को समझने की कोशिस करते ही, तो उनकी आत्मा का हनन कर देते हैं-जैसे प्यार, नैतिकता, धर्म इत्यादि। वास्तव में आस्तित्व नही रखते, लेकिन इनको समझने के लिए हमें इन्हें जीना होगा। यदि ऐसा ही तो साहित्य और दर्शन में समानता है, लेकिन फिर इनमें अंतर क्या रह जाता है ? यह समझ नही आता। उपरोक्त विचार अल्बर्ट कामू, काफ़्का,सार्त्र इत्यादि के हैं।

देशराज सिरसवाल

०२-०२-२०१०